जंगली बकरों को लुप्त होने से बचा रहे हैं किन्नौरवासी, रोपा घाटी में दिखे ये दुर्लभ आइबेक्स

दुनिया के कई देशों में इनकी संख्या शिकार की वजह से घट रही है। लेकिन जिला किन्नौर के रोपा क्षेत्र के लोग पहाड़ी जंगली बकरों को पवित्र जानवर मानते हैं। आईबेक्स बहुत ही दुर्लभ किस्म के जंगली बकरे माने जाते हैं। ये ऐसी पहाड़ियों पर रहते हैं जहां आदमी तो दूर जंगल के खूंखार जानवर तक नहीं पहुंच सकते।

जंगली बकरों को लुप्त होने से बचा रहे हैं किन्नौरवासी, रोपा घाटी में दिखे ये दुर्लभ आइबेक्स
किन्नौर में दिखे दुर्लभ आईबेक्स।

किन्नौरः 18वीं सदी तक हिमालयन आईबैक्स यानि हिमालयन जंगली बकरें सैकड़ों की झुंड में देखे जाते थे। लेकिन अब कई देशों में यह झुंड चार पांच तक सीमित रह गया है। कारण है इनका शिकार और मौसम की मार।

ये तस्वीरें आप जिला किन्नौर के रोपा घाटी की देख रहे हैं। यहां की पहाड़ियों पर जंगली बकरों को स्थानीय लोगों ने अपने कैमरे में कैद किया। यह पहाड़ी जंगली बकरे दुर्लभ प्रजाति के हैं। इनका वजन 80 किलो से 1 क्विंटल तक है। इनके बारे में हम आपको कई और रोचक चीजें बताएंगे। जैसे इनकी चमड़ी मोटी और चमकदार होती है। इन्हें भयंकर शीत की भी कोई चिंता नहीं रहती। नर के सुंदर और बड़े-बड़े सिंग होते हैं। 

आपको हैरानी होगी कि इसका रंग मौसम के अनुसार बदलता है। गर्मी में रंग भूरा होता है जो नीचे की ओर हल्का पीला हो जाता है। जबकि जाड़ों में ये पीलापन सफेद दिखता है। एक जवान जंगली बकरे के कंधों की ऊंचाई लगभग 42 इंच तक होती है। नर जंगली बकरे के सींग 40 से 55 इंच तक लंबे होते हैं। सींग माथे पर सीधे जाकर पीछे को मुड़ जाते हैं। लेकिन जंगली बकरी के सींग 12 से 15 इंच से अधिक लंबे नहीं होते।

ये आपको ऊंचे स्थानों पर ही देखने को मिलेंगे। जो कभी-कभी हिम-अंधड़ से परेशान होकर नीचे उतर आते हैं। बसंत ऋतु में जब घास की नई कल्लियां उगती है और बर्फ पिघल जाती है। तो वो उन हरी-भरी कच्ची कलियों को चरने आते हैं। इन जंगली बकरों की दृष्टि बहुत तेज होती है, पर घ्राण शक्ति तेज नहीं होती।

होशियार शिकारी बकरे को पीछे से किसी ऊंची चट्टान से चढ़कर मारते हैं। जब तक वह शिकारी को देख ना लें तब तक गोली की आवाज से भी नहीं भागते। क्योंकि उन्हें चट्टानों के टूटने की आवाज की आदत पड़ी होती है। एक और रोचक बात यह है कि जब झुंड में यह बकरे कहीं होते हैं और इन्हें संदिग्ध वस्तु दिखती है तो वह सीटी जैसी आवाज निकालते हैं और पूरी टोली वहां से भाग जाती है। 

दुनिया के कई देशों में इनकी संख्या शिकार की वजह से घट रही है। लेकिन जिला किन्नौर के रोपा क्षेत्र के लोग पहाड़ी जंगली बकरों को पवित्र जानवर मानते हैं। आईबेक्स बहुत ही दुर्लभ किस्म के जंगली बकरे माने जाते हैं। ये ऐसी पहाड़ियों पर रहते हैं जहां आदमी तो दूर जंगल के खूंखार जानवर तक नहीं पहुंच सकते।

जानकारों ने यह भी बताया कि किन्नौर के कई क्षेत्रों में आईबेक्स ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं क्योंकि स्थानीय लोग इन्हें किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ऐसे में यह आबादी क्षेत्र तक पहुंच रहे हैं। आपको यह भी जानकर हैरानी होगी कि यह किसी इंसान के द्वारा छुए घास को भी नहीं खाते हैं। ये केवल जंगल में शुद्ध और साफ घास को ही खाते हैं। ये पानी भी साफ और स्वच्छ ही पसंद करते हैं।