देवभूमि में बनेगा मां कामाख्या का भव्य शक्तिपीठ, श्रद्धालुओं के साथ लगेगा साधु और अघोरियों का डेरा

देवभूमि में बनेगा मां कामाख्या का भव्य शक्तिपीठ, श्रद्धालुओं के साथ लगेगा साधु और अघोरियों का डेरा
हिमाचल में भी बनेगा कामाख्या माता मंदिर।

सोलन:  51 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या शक्तिपीठ एक चमत्कारी महापीठ है। काली और त्रिपुर सुंदरी के बाद कामाख्या माता तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी है। असम की गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर को सभी शक्तिपीठों का महापीठ माना जाता है। मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को न तो कोई मूर्ति दिखाई देती और न ही कोई चित्र, इस मंदिर में बस एक कुंड बना है जो फूलों से ढका रहता है।

इस मंदिर के बारे में हम आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि असम के प्रसिद्ध कामाख्या माता मंदिर की तर्ज पर देवभूमि हिमाचल में भी मां कामाख्या शक्तिपीठ के दर्शन प्रदेश के लोगों को हो सकेंगे। साल 2025 तक हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के नारग में मां कामाख्या का भव्य शक्तिपीठ बनाने की तैयारी है। 

इस स्थान पर गिरी थी मां सती की योनि!
इस जगह को तंत्र साधनाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां साधु और अघोरियों का तांता लगा रहता है। यहां आकर श्रद्धालू अपनी समस्याओं का हल पाते हैं। मान्यता है कि जब मां सती ने अपना देह त्याग किया तो उसके बाद भगवान शिव का माता सती के प्रति मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के 51 भाग किए जहां-जहां ये भाग गिरे वहां माता सति का शक्तिपीठ बन गया। कामाख्या में मां सती के योनी भाग गिरा था। कामाख्या बहुत ही शक्तिशाली पीठ में से एक है। 

प्रसाद के रूप में मिलता है गीला कपड़ा 
माता के मंदिर में हर साल अंबुबाची का प्रसिद्द मेला लगता है। अंबुबाची शब्द 'अंबु' और 'बाची' शब्दों के योग से बना है। अंबु का अर्थ है पानी और बाची का अर्थ है उत्फूलन। यह मेला उस समय लगता है जब मां कामाख्या का महावारी के समय होता है। अंबुबाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट खुद ही बंद हो जाते हैं। इस दौरान उनके दर्शन निषेध हो जाते हैं। तीन दिनों के बाद मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में माता को स्नान करवाकर श्रृंगार के बाद ही श्रद्धालुओं के लिए मंदिर खोला जाता है। 

मंदिर में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओ को गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अंबुबाची वस्त्र कहते हैं। जब माता के महावारी का समय होता है तो उस दौरान आसपास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तब वस्त्र माता के रज से लाल रंग में भीगा होता है। बाद में इसी वस्त्र को श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

हिमाचल में बनेगा भव्य मंदिर
सोमवार को सोलन में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान चंडी साधना परिवार संस्था के अध्यक्ष डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि असम में जिस तरह से माता कामाख्या का मंदिर है, उसी तर्ज पर हिमाचल में भी कामाख्या शक्तिपीठ के दर्शन हिमाचल प्रदेश के लोगों को करने के लिए मिलने वाले हैं। उन्होंने बताया कि इस मंदिर को कामाख्या शक्तिपीठ की तर्ज पर ही बनाया जाएगा, लेकिन यहां पर पूजा दक्षिण पंथ यानी सात्विक तरीके से होगी। 

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह देश के उन चंद हिंदू मंदिरों में से एक है, जहां पर आज भी जानवरों की बलि दी जाती है। इस मंदिर के पास एक कुंड है जहां पर पांच दिन तक दुर्गा माता की पूजा भी की जाती है और यहां पर हजारों की संख्या में श्रद्धालू दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस मंदिर में कामाख्या मां को बकरे, कछुए और भैंसों की बलि चढ़ाई जाती है और वहीं कुछ लोग कबूतर, मछली और गन्ना भी मां कामाख्या देवी मंदिर में चढ़ाते हैं। वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि प्राचीनकाल में यहां पर मानव शिशुओं की भी बलि चढ़ाई जाती ,थी लेकिन समय के साथ अब ये प्रथा बदल गई है। अब यहां पर जानवरों के कान की स्किन का कुछ हिस्सा ही बलि चिह्न मानकर चढ़ाया जाता है। 

संजय शर्मा बताते हैं कि वो पहले प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे, लेकिन जब वे कई बीमारियों से ग्रसित होने लगे तो उन्होंने आध्यात्म की तरफ जाने की सोची। उन्होंने कहा कि वे सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए देश के साथ-साथ विदेशों में भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे कामाख्या माता मंदिर से दीक्षित हैं और अब हिमाचल के जिला सिरमौर के नारग में माता कामख्या मन्दिर बनने जा रहा है, जहां लोग माता के दर्शन कर सकेंगे।